महाराष्ट्र में मंदिरों की जमीन को लेकर फडणवीस सरकार के एक प्रस्तावित कानून ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। सरकार महाराष्ट्र देवस्थान इनाम उन्मूलन मसौदा अधिनियम, 2026 लाने की तैयारी में है। सरकार ने इसका एक मसौदा जारी किया है और इस पर लोगों से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुझाव और आपत्तियां 5 जून तक दी जा सकती हैं। इसी बीच मंदिर ट्रस्टों और हिंदू संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। उनका आरोप है कि यह कानून मंदिरों की जमीन को कमजोर करेगा और कब्जेदारों को फायदा पहुंचाएगा। 

 

इस पूरे विवाद के बीच 'देवस्थान इनाम' काफी चर्चा में बना हुआ है। पुराने समय में राजाओं, रियासतों और जमींदारों की ओर से मंदिरों को पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, पुजारियों की आजीविका और मंदिर की देखरेख के लिए जमीनें दी जाती थीं। इन्हीं जमीनों को देवस्थान इनाम कहा जाता था। आजादी के बाद कई तरह की इनाम जमीनों की व्यवस्था खत्म कर दी गई लेकिन महाराष्ट्र में मंदिरों से जुड़ी कई देवस्थान इनाम जमीनें अलग-अलग राजस्व नियमों, किरायेदारी कानूनों और ट्रस्ट कानूनों के बीच उलझी रहीं। इसी वजह से कई जगह यह विवाद बना रहा।

 

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सरकार ने क्या कहा?

सरकार का कहना है कि इसी उलझन को दूर करने के लिए नया मसौदा लाया गया है। प्रस्तावित कानून पुरानी देवस्थान इनाम व्यवस्था को खत्म कर इन जमीनों को महाराष्ट्र भूमि राजस्व संहिता के दायरे में लाने की बात करता है। सरकार की दलील है कि इससे मंदिरों की जमीन से जुड़े पुराने विवाद खत्म होंगे, रिकॉर्ड साफ होंगे और यह तय हो सकेगा कि जमीन पर कौन खेती कर सकता है, कौन कब्जे में रह सकता है और किसका क्या अधिकार होगा। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा है कि प्रस्तावित कानून मंदिरों से जमीन छीनने के लिए नहीं है, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाने के लिए है।

 

विवाद की सबसे बड़ी वजह मसौदे में कब्जेदारों और पुरानी खेती करने वालों को अधिकार देने का प्रस्ताव है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मसौदा कुछ मामलों में पुजारियों, वाहीवतदारों, मिरासदारों, किरायेदारों और कब्जेदारों को जमीन पर अधिकार देने की बात करता है। वाहीवतदार यानी मंदिर की संपत्ति और कामकाज देखने वाला पारंपरिक प्रबंधक, जबकि मिरासदार व्यक्ति या परिवार माना जाता है जो पीढ़ियों से किसी जमीन पर खेती करता आ रहा हो। 

 

सबसे ज्यादा आपत्ति अनधिकृत धारक वाले प्रावधान पर जताई जा रही है। मसौदे के अनुसार, कुछ ऐसे लोग जो औपचारिक कानूनी अधिकार के बिना देवस्थान जमीन पर कब्जे में हैं, वे भी जमीन के फिर से अनुदान के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए शर्त यह बताई गई है कि उनका कब्जा 1 जनवरी 2011 से पहले से लगातार हो, बेदखली से उन्हें कठिनाई हो सकती हो और वे सरकार की ओर से तय फीस और मार्केट वैल्यू का भुगतान करें।

मंदिर ट्रेस्टों को आपत्ति क्यों?

सरकार का तर्क है कि कई परिवार दशकों से ऐसी जमीनों पर रह रहे हैं या खेती कर रहे हैं, इसलिए सीधे बेदखली से सामाजिक तनाव और लंबी कानूनी लड़ाई पैदा हो सकती है। मंदिर ट्रस्टों और हिंदू संगठनों को यही बात सबसे ज्यादा खटक रही है। उनका कहना है कि मंदिरों की जमीन देवता और धार्मिक संस्था की संपत्ति होती है, किसी पुजारी, प्रबंधक, किरायेदार या कब्जेदार की निजी संपत्ति नहीं। उनका आरोप है कि अगर कब्जेदारों को अधिकार दिए गए तो मंदिरों की हजारों एकड़ जमीन स्थायी रूप से हाथ से निकल सकती है।

 

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने दावा किया है कि राज्य में करीब 4 लाख हेक्टेयर मंदिर ट्रस्ट जमीन इस कानून से प्रभावित हो सकती है। महासंघ का कहना है कि जमीनें मंदिरों की पूजा, उत्सव, पुजारियों के वेतन और धार्मिक कार्यों के लिए दी गई थीं, न कि निजी स्वामित्व में बांटने के लिए। 

वक्फ पर चुप कानून

विरोध करने वालों का दूसरा आरोप भेदभाव का है। मंदिर ट्रस्टों और हिंदू संगठनों का कहना है कि मसौदा हिंदू मंदिरों की संपत्ति को निशाना बनाता है, जबकि वक्फ जमीनों को इससे बाहर रखा गया है। इसी आधार पर इसे भेदभावपूर्ण बताया जा रहा है। कई संगठनों ने मांग की है कि सरकार इस मसौदे को बिना शर्त वापस ले और पहले मंदिरों की मूल समस्याओं पर ध्यान दे, जैसे मंदिरों की मरम्मत, पुजारियों का वेतन, धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और अतिक्रमण हटाने की व्यवस्था। 

 

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जमीन हड़पने को लेकर सख्त नियम

मसौदे में मंदिर जमीन हड़पने वालों के खिलाफ कड़े प्रावधान भी बताए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अवैध बिक्री, ट्रांसफर या लीज को रद्द करने, कलेक्टर को त्वरित बेदखली का अधिकार देने, दो से पांच साल तक की सजा और जमीन के बाजार मूल्य तक जुर्माने का प्रस्ताव है। सरकार इसी हिस्से को दिखाकर कह रही है कि कानून मंदिर जमीन बचाने वाला है लेकिन विरोधियों का कहना है कि एक तरफ सरकार भविष्य के अतिक्रमण पर कार्रवाई की बात कर रही है, दूसरी तरफ पुराने कब्जों को वैध करने का रास्ता भी खोल रही है। सरकार इसे पुराने विवादों का समाधान बता रही है, जबकि मंदिर संगठन इसे मंदिरों की संपत्ति पर खतरा मान रहे हैं। सरकार के अगले कदम पर तमाम संगठों की नजरें टिकी हैं।