भारत में बहुत तेजी से उद्योग और आबादी बढ़ रही है। इसने देश की अर्थव्यवस्था में तो तेजी लाई है लेकिन इसका एक बड़ा नुकसान हमारी जलवायु को भुगतना पड़ रहा है। एनवायर्नमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशन्स में छपी एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि 1750 से लेकर 2024 तक भारत से हुए कुल गैस उत्सर्जन की वजह से दुनिया के औसत तापमान में 0.05 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो चुकी है। इस आंकड़े के साथ भारत अब ऐतिहासिक रूप से दुनिया में सबसे ज्यादा गर्मी बढ़ाने वाला पांचवां सबसे बड़ा देश बन गया है।

 

हालांकि, अगर हम सबसे ज्यादा प्रदूषण करने वाले अमेरिका से भारत की तुलना करें, तो हमारा असर काफी कम है। अकेले अमेरिका की वजह से दुनिया के तापमान में करीब 0.27 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है। हमारे लिए चिंता की बात यह है कि देश का जितना भी तापमान प्रभाव रहा है, उसमें से आधा से ज्यादा हिस्सा 1990 के बाद के सालों में दर्ज किया गया है।

 

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1990 के बाद क्यों बढ़ी तेजी?

पिछले कुछ दशकों में भारत में तेजी से शहर बसे, नए कारखाने लगे और बिजली व गाड़ियों की मांग बढ़ी। बिजली बनाने, ट्रांसपोर्टेशन और फैक्ट्रियों के काम के लिए कोयले और तेल का इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ गया, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन तेजी से फैला। अब बात करते हैं रिपोर्ट में सबसे बड़ा कारण किसे माना गया है जिसने दुनिया के औसत तापमान में भारत के योगदान को बढ़ा दिया है। 

एनर्जी और खेती

स्टडी में यह बताया गया है कि भारत में सबसे ज्यादा असर दो मुख्य सेक्टर की वजह से रहे और बढ़े हैं। पहला, बिजली बनाने और गाड़ियों में कोयले व तेल के इस्तेमाल की वजह से ऊर्जा क्षेत्र का असर सबसे ज्यादा 61 प्रतिशत रहा।

दूसरा, खेती और पशुपालन से निकलने वाली गैसों का योगदान करीब 28 प्रतिशत है। धान के खेतों और मवेशियों से मीथेन निकलती है, जबकि खेती के अन्य तरीकों से नाइट्रस ऑक्साइड बनती है।

 

यह रिसर्च ब्रिटेन की क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी और आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने 'फेयर मॉडल' की मदद से तैयार किया है। इसमें केवल कार्बन ही नहीं बल्कि मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड को भी शामिल किया गया ताकि सही तस्वीर दिखे।

 

मीथेन गैस भले ही हवा में कार्बन डाइऑक्साइड से कम समय टिकती हो लेकिन यह बहुत तेजी से गर्मी रोकती है। इसीलिए भारत के लिए जलवायु नीतियां बनाते समय सिर्फ कार्बन पर ध्यान देना काफी नहीं होगा।

 

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आगे का रास्ता और चुनौतियां

भारत ने साल 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पाने के लिए देश को कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। जैसे, कोयले पर निर्भरता कम करके सौर ऊर्जा और अन्य स्वच्छ ऊर्जा के स्रोतों को तेजी से बढ़ाना होगा।

 

जानवरों के चारे में बदलाव करना होगा ताकि मीथेन कम बने। धान की खेती में पानी के इस्तेमाल के तरीकों को बदलना होगा। इस अध्ययन का सीधा संदेश है कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी अब सिर्फ पुराने अमीर देशों की नहीं है। भारत जैसे तेजी से बढ़ते देशों को भी अपनी विकास की रफ्तार के साथ पर्यावरण को बचाने का सही संतुलन बनाना होगा। 

 

भले ही हम इस बात से इंकार कर सकते हैं कि नेपाल में आए भारी तबाही का जिम्मेदार भारत नहीं है। पर एक विकासशील देश होने के साथ हमारी जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ जाती है कि हम विकास के कार्यों के लिए पर्यावरण को ताक पर नहीं रख सकते। साथ ही यह कह कर नहीं बच सकते हैं कि अमेरिका और यूरोप की कई देशों ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई तो हम इस पर क्यों ध्यान दें।